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पद्म विभूषित जगद्गुरु रामभद्राचार्य के मुखारविंद से श्री राम कथा का श्रवण करने पहुंच रहा है अपार जनसैलाब।

अमेठी की धारा पर पहली बार इस तरह से हो रही है प्रभु श्री राम की दिव्य कथा।

पद्म विभूषित जगद्गुरु रामभद्राचार्य के मुखारविंद से श्री राम कथा का श्रवण करने पहुंच रहा है अपार जनसैलाब।

जनपद मुख्यालय गौरीगंज स्थित रणंजय इंटर कालेज के खेल मैदान पर भाजपा नेता डॉ अनिल त्रिपाठी व प्रकाश मिश्र के संयोजन में चल रही श्री राम कथा के सातवें दिन स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि भगवान का प्रेम ही सही पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष क्षणिक पुरुषार्थ हैं केवल भगवान के प्रति मन में प्रेम की उत्पत्ति ही व्यक्ति का सही पुरुषार्थ है। पत्नि का पति से या पति का पत्नि से प्रेम, प्रेम नहीं होता। प्रेम केवल नित्य जीव का ईश्वर से होता है। प्रेम वासना मूलक नहीं उपासना मूलक होता है। गोपियों का प्रेम, प्रेम तो है लेकिन प्रथम नहीं, प्रेम जन्मा कहाँ से इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम की जन्मदात्री गोपियाँ नहीं है। प्रेम का जन्म भरत से होता है। गोपियों ने प्रेम के दौरान कृष्ण को कई ताने, उलाहने दिये लेकिन श्री राम के प्रेम उपासक भैया भरत ने कभी स्वप्न में भी नहीं कहा कि मैंने आपके लिए राजपाट छोड़ दिया। महाराज दशरथ स्वर्गलोक प्रस्थान की चर्चा करते हुए एक मार्मिक गीत :
रजिया कौन अब चलावे, भैया भरत के बिना। छत्र भंग भया कोसलपुर, छाया दसहुँ दिशि घोर अंधेरा। हाहाकार मचा त्रिभुवन में, विपत्ति विषम ने घेरा। रहिया कौन अब दिखावे, धीरज कौन अब धरावे, लजिया कौन अब बचावे भैया भरत के बिना।।
सुनाते हुए स्वामी स्वामी रामभद्राचार्य व उपस्थित जनसमूह बड़ा भावुक हो उठा।

पद्म विभूषित जगद्गुरु रामभद्राचार्य के मुखारविंद से श्री राम कथा का श्रवण करने पहुंच रहा है अपार जनसैलाब।

भरत के तीन शब्दों भ, र तथा त की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि भ माने भक्ति, र माने रस, त माने तत्व । भक्ति रस गंगा, राम रस रूपी यमुना और ज्ञान तत्व सरस्वती का जहाँ प्रवाह है उस प्रयाग का नाम है भरत। भ के पांच शब्दार्थ भगवान, भक्त, भक्ति, भाव और भजन में जो रत वही भरत है। पूजा में दीपक बारहवें स्थान पर है । इसी प्रकार कैकेयी के बारह कष्टों राम, लक्ष्मण, सीता वनवास, दशरथ मरण, विधवापन, अपयश, शोक, संताप, कुराज्य, अपमान, अकाज के बाद भरत का नाम आता है। “जानहुँ भरत सकल कुलदीपा” व्याख्या करते हुए कहा कि दीपक में तीन चीजें होती हैं बाती, घी और अग्नि । 14 वर्ष की राम भक्ति रूपी बाती, राम के प्रति प्रेम का घी, राम के बिरह की अग्नि इन तीनों से जले दीपक का नाम है भरत। आगे उन्होंने समुद्र मंथन और उसके बाद निकले रत्नों की एक एक कर चर्चा करते हुए व्याख्या की। कथा में श्रोताओं का अपार जनसमुदाय उमड़ पड़ा था। स्वामी राम भद्राचार्य ने कहा कि उनका घर पूरा पूर्वांचल है और वे पूर्वाचल के बेटे हैं।आज की कथा सुनने के लिए सेवा निवृत्त प्रमुख सचिव न्याय रामहरि विजय त्रिपाठी, अमेठी विधायक प्रतिनिधि अनंत विक्रम सिंह, प्रोफेसर मंजुला जायसवाल इलाहाबाद विश्वविद्यालय, डॉ त्रिवेणी सिंह आदि उपस्थित रहे।

पद्म विभूषित जगद्गुरु रामभद्राचार्य के मुखारविंद से श्री राम कथा का श्रवण करने पहुंच रहा है अपार जनसैलाब।

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