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दांडी मार्च : महिलाओं की ऐतिहासिक भागीदारी…कैसे नमक सत्याग्रह बना जनक्रांति

1930 के उस दौर में अंग्रेजों ने नमक पर इतना ज्यादा टैक्स लगा रखा था कि कीमत आम जनता के लिए बहुत बढ़ गई थी। जब महात्मा गांधी ने ‘नमक’ को हथियार बनाने की बात कही, तो जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे दिग्गज नेता भी सोच में पड़ गए थे। उन्हें लगा कि आम नमक से कैसी क्रांति? लेकिन गांधी जी की दूरदृष्टि उस समय किसी आम नेता की समझ से बहुत आगे थी।

1882 का ‘ब्रिटिश साल्ट एक्ट’ एक ऐसा क्रूर कानून था जिसने भारतीयों को अपने ही देश के समंदर से नमक बनाने पर रोक लगा दी थी। इसे इतना महंगा कर दिया गया कि गरीबों की थाली से स्वाद और सेहत दोनों छिन गए।

12 मार्च 1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम के बाहर हजारों की भीड़ जमा थी। 61 वर्षीय महात्मा गांधी ने 78 चुने हुए स्वयंसेवकों के साथ अपनी पदयात्रा शुरू की। इसमें 19 साल के गुजराती युवा पृथ्वीराज से लेकर 44 साल के बंगाली दुर्गेश चंद्र तक शामिल थे। नेपाल के महावीर गिरी और उत्तराखंड के पहाड़ों से आए ज्योतिराम कांडपाल जैसे लोग भी इस दल का हिस्सा थे।

240 मील (करीब 388 किलोमीटर) दूर नवसारी जिले का एक छोटा सा तटीय गांव दांडी तक पहुंचने का लक्ष्य था। अगले 24 दिनों तक यह जत्था रोज 16 से 24 किलोमीटर नंगे पैर या साधारण चप्पलों में चला। रास्ते में हजारों लोग जुड़ते गए।

5 अप्रैल की शाम यह विशाल जनसैलाब दांडी के तट पर पहुंचा। अगले दिन 6 अप्रैल की सुबह 8:30 बजे गांधी जी ने समंदर के पानी में स्नान किया। फिर वे कीचड़ भरे तट पर झुके और वाष्पीकरण से जमे प्राकृतिक नमक को अपनी मुट्ठी में उठा लिया। गांधी जी ने कहा था कि इस नमक के साथ मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूं।

इसके बाद तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक, लाखों लोगों ने समंदर के किनारे अवैध रूप से नमक बनाना शुरू कर दिया। इस आंदोलन की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि पहली बार हजारों महिलाएं घरों की चौखट लांघकर सड़कों पर आ गईं। उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और शराब की दुकानों पर धरने दिए।

इस विरोध प्रदर्शन के चलते अंग्रेज सरकार बौखला गई थी। 4 मई की आधी रात को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद धरसाना में जो हुआ, उसने दुनिया को रुला दिया। 21 मई को सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में 2,500 शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर ब्रिटिश पुलिस ने लाठियों से जो क्रूर प्रहार किया, वह अमानवीय था। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने जब इस बर्बरता की रिपोर्टिंग की, तो पूरी दुनिया में ब्रिटिश राज की निंदा हुई। ‘टाइम मैगजीन’ ने गांधी जी को ‘मैन ऑफ द ईयर’ घोषित कर दिया।

इस मार्च ने अंग्रेजों के आर्थिक ढांचे की कमर तोड़ दी। मजबूर होकर वायसराय लॉर्ड इरविन को गांधीजी के साथ बराबरी के दर्जे पर बैठकर ‘गांधी-इरविन समझौता’ (1931) करना पड़ा। गांधी-इरविन समझौता, जिसे ‘दिल्ली समझौता’ के नाम से भी जाना जाता है।

इस समझौते के जरिए कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन को तुरंत बंद करने पर सहमत हुई। ब्रिटिश सरकार उन सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गई जिन पर हिंसा का आरोप नहीं था। समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को अपने उपभोग के लिए बिना कर दिए नमक बनाने की अनुमति दी गई। शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से धरना देने के अधिकार को स्वीकार किया गया। कांग्रेस दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमत हो गई। सरकार ने आंदोलन के दौरान जब्त की गई संपत्ति (जो अभी बेची नहीं गई थी) को वापस करने का आश्वासन दिया।

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