उत्तर प्रदेशबहराइच

आखिर क्यों दशहरा के बाद भी यूपी के इस गांव में नहीं खत्म हो सकी रामलीला, पैसों की कमी ने बदल डाला बहुत कुछ

15 अक्टूबर को पूरे देश में असत्य पर सत्य की विजय का त्योहार दशहरा मनाया गया. रावण जलाने के साथ ही रामलीला भी खत्म हुई. लेकिन यूपी (Uttar Pradesh) के बहराइच जिले के कई इलाके ऐसे हैं जहां रामलीला अभी भी चल रही है और यहां रावण दहन अलग-अलग दिनों में किया जाएगा. लोगों का रामलीला के प्रति कम आकर्षण इसका सबसे बड़ा कारण है. इसी के साथ पैसों की कमी से भी रामलीला की रौनक कम हो रही है. कई गांवों की रामलीला इसी वजह से बंद हो गई है. रामलीला आयोजकों का कहना है कि दर्शक भी अब ज्यादा आना पसंद नहीं करते. कोरोना के साथ ही इसका सबसे बड़ा कारण है कि वह मोबाइल और टीवी पर ही रामलीला देख लेते हैं.

बहराइच के बभनियावां गांव में पिछले 35 सालों से रामलीला होती है. पिछले साल कोरोना भी यहां की रामलीला नहीं रोक सका. लेकिन इस साल चंदे की कमी के कारण रामलीला कमेटी के लोग परेशान हैं. उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल पैसे की है. रामलीला के बाद कलाकारों को पैसा कैसे दिया जाए यह एक बड़ी समस्या है. सामान्य हिसाब लगाने के बाद करीब 60-70 हजार रुपए का खर्च है. लेकिन कमेटी का कहना है कि अभी सिर्फ 30 हजार रुपए ही इकट्ठा हुए हैं और अगर पैसे नहीं आए तो अपनी जेब से भरना पड़ेगा.

कलाकारों की भी कमी

रामलीला कमेटी का कहना है कि अभिनय करने वाले गांव के कलाकार भी अब पीछे हटने लगे हैं. कमेटी का कहना है कि 4-5 साल पहले जो कलाकार रामलीला के लिए सबसे आगे रहते थे वह अब गांव से निकल कर शहर चले गए हैं, इसके कारण वह अभिनय नहीं करते हैं. वहीं अगर बाहर से कलाकारों को लाया जाए तो उनका अलग से खर्च आएगा, जिसे कमेटी नहीं उठा पाएगी.

हालांकि कमेटी ने इसका भी उपाय निकाला है. रामलीला में अभिनय के लिए अब गांव की युवा पीढ़ी को आगे लाया जा रहा है. 10-15 साल के बच्चे इसमें अभिनय कर रहे हैं. बभनियावां की रामलीला कमेटी में उत्कर्ष अभिनय करते हैं, जिनकी उम्र अभी सिर्फ 12 साल है. लेकिन वह विश्वामित्र, महामंत्री और लक्ष्मण समेत कई पात्रों को निभा चुके हैं. गांव की रामलीला की प्रथा को बचाने के लिए उत्कर्ष उत्साहित हैं. उनका कहना है कि गांव की रामलीला हमारी परंपरा रही है, यह बंद न हो इसी लिए मैं अभिनय करता हूं और पढ़ाई के साथ डायलॉग भी याद करता हूं.

‘मोबाइल और टीवी पर ही लोग देखते हैं रामलीला’

रामलीला कमेटी के प्रबंधक और लखनऊ में वकालत करने वाले संदीप मिश्रा रावण का किरदार निभाते हैं. हर साल रामलीला के दौरान वह अपने काम से छुट्टी लेकर 10 दिनों के लिए गांव आते हैं. बातचीत में उन्होंने बताया कि दर्शकों की लगातार कमी है. इस वजह से रावण दहन का कार्यक्रम दशहरा के पांच दिन बाद रखने का फैसला लिया गया है. ताकि जब मेला लगे तो आसपास के गांव के लोग भी उसमें शामिल हो सकें. पास के ही गांव कोठारे में रविवार को रावण दहन किया गया.

उन्होंने कहा कि रामलीला में आने वालों को कोरोना गाइडलाइन का पालन करने के लिए कहा जाता है. फिर भी लोग इस जानलेवा वायरस के डर से कम ही आते हैं. इसके साथ ही उन्होंने दर्शकों की कमी के लिए मोबाइल और टीवी को जिम्मेदार ठहराया. उनका कहना है कि लोग मोबाइल और टीवी पर ही रामलीला देख लेते हैं. इस वजह से भी लोग कम ही आते हैं. कई लोग ऐसे हैं जो घर के किसी एक सदस्य को रामलीला में भेज देंगे और वहां से वीडियो कॉल के जरिए रामलीला का आनंद लेंगे. उनका कहना है कि गांव में एक साल पहले तक मोबाइल नेटवर्क नहीं था, उस समय दर्शकों की भीड़ होती थी.

कई गांवों में रामलीला हुई बंद

कोरोना की वजह से दर्शकों की भीड़ में आई कमी के कारण दशकों से चली आ रही कई गांवों की रामलीला बंद हो गई. बहराइच के खजुरार और महादेव जैसे गांवों में रामलीला पिछले दो सालों से बंद है. वहीं पास के ही इकौना कस्बे की रामलीला बहुत मशहूर है, लेकिन उसका भी दो सालों से आयोजन नहीं हो सका है.

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