ओपिनियन

‘चापलूसी का डंका बजता है, मगर हमेशा नहीं’

मानव के अस्तित्व से ही चाटुकारिता का जन्म हुआ है तथा लोकतंत्र ने तो इसे नए आयाम दिए हैं। यहां पर सत्ता या बाहुबलियों का दबदबा होगा वहां पर चापलूसी की संभावनाएं और भी बढऩे-फूलने लगती हैं। कभी समय था जब चापलूसी केवल अफसरों के इर्द-गिर्द ही घूमती थी मगर अब राजनेताओं के पास और भी बड़ा जमावड़ा लगा रहता है। चापलूसी की न तो कोई भाषा होती है और न ही कोई व्याकरण, इसमें तो केवल मीठी जिव्हा का ही कमाल होता है। वास्तव में आत्मप्रशंसा हर किसी को पसंद होती है। कुशल चाटुकार इसी कमजोरी की सीढ़ी पर चढ़कर वांछित सिद्धि प्राप्त करते रहते हैं।

अधीनस्थ कर्मचारी कार्य-कत्र्तव्यों में सबसे बड़े चापलूस होते हैं। जैसे ही कोई अफसर अपने पद पर तैनात होता है तो बहुत सुना है कि अधीनस्थ कर्मचारी कहने लगते हैं कि ‘सर’ हमने आपके बारे में बहुत सुना है, आप तो हर व्यक्ति की बात सुनने वाले हैं और बहुत ही निष्पक्षता से काम करते हैं। सुबह व शाम को अच्छे-अच्छे आदर्श वाक्यों के साथ उन्हें सत्कार के साथ बधाई देना इत्यादि ऐसे कई मलाईदार तरीके अपनाए जाते हैं। चाटुकारों का उद्देश्य हर समय और हर स्थिति में अपने आराध्य की छोटी से छोटी बात को महिमामंडित करना होता है। चाटुकार देश और काल की सीमाओं से परे होते हैं तथा ये हर देश व हर काल में देखे जा सकते हैं।

सत्ता और शक्ति के नजदीक होने के कारण ये हमेशा सुविधापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। इन्हें अपने ईमान या पद की गरिमा से कोई वास्ता नहीं होता है। चापलूसी की कला में निपुण लोग नदी पार होते ही नाविक को लात मारने की कला में निपुण होते हैं। चापलूस असल में आपको अपने हितैषी लगते हैं क्योंकि वे वो ही बात करते हैं जो आपको अच्छी लगती है। चापलूसों को पहचानना बहुत मुश्किल होता है। आपका सम्मान जताने के लिए उनके हाथ हमेशा जुड़े होते हैं। अधिकारी हो या कर्मचारी, नेता हो या अभिनेता, पत्रकार हो या अन्य मीडिया वाला, सबको पुचकारा जाना अच्छा लगता है। कहते हैं कि एक बार अकबर और बीरबल कहीं जा रहे थे तथा राजा ने बैंगन के पौधे पर लगे बैंगनों को देखकर कहा कि ये स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छे होते हैं, तब बीरबल ने तुरन्त जवाब दिया कि जहांपनाह ये तो बहुगुण तथा सभी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होते हैं।

कुछ देर चलने के बाद अकबर ने फिर बैंगनों की बात दोहराई और कहा कि बैंगन शरीर में कई व्याधियां उत्पन्न करते हैं तथा पेट को भी खराब कर देते हैं, तब बीरबल ने झट से कहा कि बैंगन अच्छे नहीं होते तथा शरीर को हानि पहुंचाते हैं। इस पर अकबर ने बीरबल से कहा कि पहले तो आप इन्हें बहुत अच्छा कह रहे थे मगर अब इनकी बुराइयां निकाल रहे हो। बीरबल बहुत ही हाजिर जवाब था, उसने कहा, ‘‘जहांपनाह मैं नौकरी आपकी करता हूं न कि बैंगन की।’’ सत्ता या अधिकारी बदलते ही चापलूसों का पाला रातों-रात बदल जाता है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की उक्ति उन पर खरी उतरती है तथा यह स्वाभाविक है कि वे उसी के पीछे आकर खड़े होंगे जिसकी कोई हैसियत होगी।

हमें चाणक्य की इन बातों को नहीं भूलना चाहिए कि जो शक्ति विहीन होते हुए भी मन से नहीं हारता उसको दुनिया की कोई भी ताकत नहीं हरा  सकती। हर सत्ताधारी सामान्यत: कान का कच्चा होता है तथा होशियार व चतुर चाटुकार नौकरशाह अपने अधिकारी से अपनी मनपसंद के आदेश करवाने में सफल हो जाते हैं तथा वे अपनी वाॢषक गोपनीय रिपोर्ट को उत्कृष्ट रूप से लिखवाने में भी सफल रहते हैं। यह भी देखा गया है कि कई बार तो कुछ अधिकारी अपने मुखिया के अंगरक्षक की खुशामद करते रहते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि अमुक अंगरक्षक मुख्य अधिकारी का बहुत वफादार है तथा वह उसका गुणगान करके उसे अपने बॉस का प्रशंसा पात्र बना सकता है। हमने यह भी देखा कि जब कोई मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत होता है तो अधिकारी उसे आवश्यकता से अधिक मान-सम्मान देते रहते हैं जिसके परिणामस्वरूप वह कनिष्ठ अधिकारी अन्य अधिकारियों के लिए भी ऐसी धुरी का कार्य करने में लग पड़ता है कि सभी लोग उसी के आगे-पीछे मंडराने लग जाते हैं।

चुनावों के बाद जैसे ही सत्ता बदलती है, चापलूसों का दल रातों-रात अपनी निष्ठाएं बदल कर उनकी अग्रिम पंक्ति में बैठ जाता है। चापलूसी हमारे लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ पत्रकारों/मीडिया का भी पीछा नहीं छोड़ती। चापलूसी की इस दौड़-भाग में कुछ मीडिया पत्रकारों की अधिकारियों व राजनीतिज्ञों के साथ अवांछित सांठ-गांठ होनी आरंभ हो जाती है तथा वे मिलकर एक-दूसरे की जरूरत के अनुसार सहायता करते रहते हैं। कहते हैं कि निंदक से चापलूस कहीं अच्छा होता है क्योंकि वह तो आपकी केवल भत्र्सना या निंदा ही करता है जबकि चापलूसी तो वह तलवार है जो दोनों तरफ से काटती है तथा इस तलवार द्वारा पैदा किए गए जख्म मरहम लगाने से भी नहीं भरते। चाटुकारों व चापलूसों का अंतत: असली चेहरा सबको पता लग जाता है तथा उनको एक ऐसा समय देखना पड़ता है कि उन्हें कोई मुंह तक नहीं लगाता।

आज निष्ठावान, चरित्रवान व प्रज्ञावान कुछ ही ऐसे कर्मचारी व अधिकारी हैं जो बिना किसी चाटुकारिता से अपना कार्य ईमानदारी और लग्न से करते हैं तथा समाज में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होते हैं। सत्ता में रहने वाले सभी वर्ग के लोगों को चापलूसों से सतर्क रहना चाहिए अन्यथा अंधकार भरी रातों में केवल उल्लू ही उड़ानें भरेंगे तथा ‘हंस’ जैसे सुंदर पंखों वाले पक्षियों को भी नोच-नोच कर काट डालेंगे। किसी भी सरकार के पतन का कारण भी अप्रत्यक्ष रूप से चाटुकार ही बनते हैं क्योंकि वे सरकार को सब हरा-हरा ही दिखते हैं, बहुत ही कम अधिकारी होते हैं जो सरकार की नाकामियों को मुख्यमंत्री या मंत्रियों को बताने की हिम्मत रख पाते हैं।

सरकार को अंधेरे में रखा जाता है तथा जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं तब यह चालाक कौम पहले ही दूसरी पार्टी के नेताओं से अपनी गोटियां फिट करने लग पड़ती है तथा साहिल को नदी के बीच में ही छोड़कर अपनी नाव का रुख बदल लेती है। लेखक हरितका सुमन ने ठीक ही कहा है ‘चाटुकार का आचरण मालिक का गुण गाए। ज्यों धतूरा खायके मादकता अधिकाय।’

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