Khabri Adda
खबर तह तक

कारपोरेट और हिन्दुत्व के नापाक गठजोड़ की सबसे बड़ी चुनौती!

0
नरेश दीक्षित

भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के अभियान में लगे नरेंद्र मोदी 3 अक्तूबर 2001को गुजरात के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के पांच महीने के भीतर ही उनके नेतृत्व में 28 फरवरी 2002 को गुजरात नरसंहार को अंजाम दिया गया और इसके लिए गोधरा कांड का सहारा लिया गया। गुजरात नरसंहार में सैकड़ों लोगों का कत्ले-आम किया गया महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया तथा कइयों को जिंदा जला दिया गया (आधिकारिक तौर पर 790 )  इस नरसंहार ने मोदी को हिन्दुत्व की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया। खुले तौर पर कारपोरेट समर्थक नीतियों एवं फैसलों ने उन्हें कारपोरेट जगत का भी चेहरा बना दिया। उन्होंने हिन्दुत्व की राजनीति और कारपोरेट के गठजोड़ के आधार पर गुजरात माॅडल खड़ा किया, जिसका मूल तत्व था हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के आधार पर वोट हासिल कर सत्ता हथियाना और इस सत्ता का इस्तेमाल हिन्दू राष्ट्र की परियोजना एवं कारपोरेट घरानों के मुनाफों एवं हितों की पूर्ति करना। इसके बदले में कारपोरेट घरानों ने मोदी जी की चुनावी जीत को सुनिश्चित बनाने के लिए और हिन्दू राष्ट्र की परियोजना को अंजाम देने के लिए अपनी तिजोरी खोल दी और अपनी मीडिया तथा भाड़े के बुद्धिजीवियों को उनकी सेवा में लगा दिया। यह संघ और कारपोरेट के परस्पर लेन-देन एक सौदा था, जिसके मध्यस्थ मोदी जी बने।
करीब 14 वर्षो तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होने कारपोरेट को अश्वत कर दिया था कि वे उनके हितों की पूर्ति एवं रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और संघ को इस बात के मुतमईन कर दिया कि हिन्दुत्व राष्ट्र की परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कोई भी कदम उठाने में उन्हे किसी तरह की हिचक नहीं होगी। अपनी इन्ही कारगुजारियों के चलते नरेन्द्र मोदी 2014 में आरएसएस और कारपोरेट के चहेते के रूप में अपने अन्य सीनियर भाजपा नेताओं को हटा कर प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार बने और बाद में भारत के प्रधानमंत्री। हिन्दू राष्ट्र की परियोजना को उन्होंने राष्ट्रवाद का जामा पहनाया और कारपोरेट हितों की पूर्ति को विकास जैसा खूबसूरत नारा देकर सरकारी संस्थाओं को औने-पौने में अपने मित्रों को बेचना शुरू कर दिया। इस तरह उन्होने राष्ट्रवाद और विकास के चैंपियन के रूप में खुद को भारत की जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है। भारतीय जनता का एक बड़ा हिस्सा उनके विकास और राष्ट्रवाद के इस छलावे का शिकार भी बना और अभी भी बन रहा है। विभिन्न चुनाओं में मोदी के नाम पर मिले वोट इसके सबूत हैं।
2014 से अब तक करीब सात साल के कार्यकाल में उन्होने राष्ट्रवाद और विकास का खेल खेला है। इस खेल को निरंतर किसी न किसी रूप में चुनौती भी मिलती रहीं हैं । एससी-एसटी एक्ट के खात्मे के बाद अप्रैल 2018 में दलित-बहुजन समाज ने इसे चुनौती दी और मोदी सरकार को झुकना पड़ा। 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीयन के विरोध में हुए जनांदोलन ने उससे भी बड़ी चुनौती पेश की जिसका प्रतीक शाहीन बाग बना और जिसका अगुवा वे मुस्लिम महिलाएं बनीं जिन्हें संघ-भाजपा ने सबसे अधिक दबी-कुचली एवं पिछडी महिलाओं का प्रतीक बताया था। लेकिन कारपोरेट और हिन्दुत्व की राजनीति के इस गठजोड़ को अबतक की सबसे बड़ी चुनौती किसानों के आन्दोलन द्वारा मिल रही है, जिसे धीरे-धीरे देश के अन्य तबको बुद्धि जीवनियों का समर्थन मिल रहा है और यह समर्थन निरंतर बढ़ता जा रहा है।
1991के बाद भारत के इतिहास का यह सबसे बड़ा जनांदोलन है, जिसके निशाने पर सीधे कारपोरेट घराने और उनके राजनीतिक नुमाइंदे (नरेन्द्र मोदी) है । साथ ही अन्य उत्पीडित सामाजिक समूहों की भी सहानुभूति इस आन्दोलन के साथ है, जिसमें अल्प संख्यक धार्मिक समुदायों के लोग भी शामिल हैं। इस आन्दोलन के साथ इनकी गहरी सहानुभूति दिखाईं दे रही है, क्योंकि मोदी के शासनकाल में हिन्दुत्व की राजनीतिक और कारपोरेट के गठजोड़ के सबसे बड़े निशाने वही बने। सच तो यह है कि हिन्दुत्व की राजनीतिक और कारपोरेट के वच॔स्व विरोधी सभी शक्तियां इस आन्दोलन के साथ एकजुट हो रही हैं और इस आन्दोलन को देश और देश के जन को बचाने के एक मौके के रूप में देख रही है और वास्तव में यह ऐतिहासिक मौका भी है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि व्यापक जन सहभागिता वाले किसी बड़े जनांदोलन के बिना कोई बड़ा परिवत॔न संभव नहीं होता और न ही अन्यायी सत्ता को झुकाया या उखाड़ कर फेंका जा सकता है, लेकिन व्यापक जन सहभागिता के साथ जनांदोलन का संगठित होना भी जरूरी होता है, नहीं तो कभी भी उस जनांदोलन को भटकाया या तोड़ा जा सकता है । वर्तमान किसान जनांदोलन पूरी तरह संगठित है और जिस संयुक्त किसान मोर्चा के बेनर तले यह किसान संघर्ष कर रहे हैं, उनमें अधिकांश संगठन लम्बे समय से किसानों के बीच काम कर रहे हैं और उनके बीच उनकी पूरी स्वीकृति है।
इस जनांदोलन के निशाने पर कारपोरेट और उनके दोस्त नरेन्द्र मोदी है। आन्दोलन में शिरकत कर रहे हर व्यकि की जुबान पर यह बात है कि यह मोदी की सरकार नहीं है, यह अंबानी और अडानी की सरकार है मोदी उसके पालतू चाकर से अधिक कुछ नहीं है । आन्दोलन में लगे पोस्टर और नारे भी इस बात के सबूत हैं। अधिकांश नारों के निशाने पर अंबानी-अडानी और मोदी है। किसान यह भी समझ रहे हैं कि मुख्य धारा के मीडिया के मालिक यही अंबानी-अडानी है और यह मोदी मीडिया है। किसानों के मंचों पर कारपोरेट के मालिकाने वाली मोदी मीडिया निशाने पर है। अंबानी-अडानीऔर मोदी परस्त कई सारे मीडिया घरानों को किसानों के बीच दुशमन की तरह देखा जा रहा है। किसान सिर्फ और सिर्फ वैकल्पिक मीडिया और सोशल मीडिया पर भरोसा कर रहे हैं और मुख्यधारा के सिर्फ उन मीडिया हाउस के मीडिया से बात कर रहे हैं जिनके बारे में उनकी राय है ये मीडिया हाउस अंबानी-अडानी या मोदी के जरखरीद गुलाम नहीं हैं और तटस्थ रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शायद आजादी के बाद पहली बार किसी बड़े जनांदोलन के सीधे निशाने पर सत्ता और पूंजीपतियों का गठजोड़ और उनकी मददगार मीडिया आई है ।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More