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सुलतानपर में पत्रकारिता के स्तम्भ रहे बाबू राजेश्वर सिंह जी पंचतत्व में हुए विलीन

भूपेंद्र सिंह


  • शुक्रवार को उनके आसमयिक निधन से पत्रकारों, बुद्धिजीवियों में शोक की लहर

सुलतानपर। जनपद के वरिष्ठ पत्रकार, ऐतिहासकार, अधिवक्ता बाबू राजेश्वर सिंह अब हम सभी के बीच नही रहे। 86वर्ष की आयु में शुक्रवार को उनका आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की खबर सुनते ही जिले भर के सभी पत्रकारों, बुद्धि जीवियों, अधिवक्ता गणों में शोक की लहर व्याप्त हो गयी। दिनभर उनके अंतिम दर्शन को लोग पहुंचते रहे।दोपहर बाद आदि गंगा गोमती नदी के किनारे हथियानाला घाट पर सैकड़ो शुभचिंतकों की मौजूदगी में उनके पार्थिव शरीर का अश्रुपूरित आँखों से अंतिम संस्कार कर दिया गया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में लकीर खींचने वाले जिले के इस महान सख्शियत का अचानक इस कदर चले जाना लोगों को बेहद अखर रहा है।जिसकी क्षतिपूर्ति होना गैर लाजिमी लग रहा है।
जब तक वह इस दुनियां में रहे सबको सहेजे- संजोये शब्दों में पिरोया और एक अनमोल किताब “सुल्तानपुर ; इतिहास की झलक ” लिख डाली।

इस किताब के जरिये उन्होंने उन तमाम लोगों को जो सुल्तानपुर में रहते हैं या कहीं दूर रहकर सुल्तानपुर को जानना समझना चाहते हैं, की जिज्ञासाएं तृप्त कीं। वह क्षण गर्व-गौरव के होते हैं,जब प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल यहां के युवक उनके बारे में बताते हैं कि उनकी सफलता में इस किताब ने कितनी मदद की। वकालत का पेशा उनके रोजी रोटी का जरिया थी। साहित्य और पत्रकारिता जीने का। आंखों ने जब तक साथ दिया वह निरन्तर सृजन से जीवन को सार्थक करते रहे।

पिछले कुछ वर्षों से सुल्तानपुर के नाम के बदलाव की मुहिम में लगे लोगों ने सुल्तानपुर पर लिखी उनकी उक्त किताब का सहारा लिया। राजपूताना शौर्य फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राज्यपाल राम नाइक से भेंट में सुल्तानपुर के प्राचीन नाम ” कुशभवनपुर ” के समर्थन में ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ इस पुस्तक को संलग्न किया। नायक जी ने पुस्तक के संदर्भों को काफी गम्भीरता से लिया।

मुख्यमंत्री को इस विषय में लिखे अपने पत्र में पुस्तक के सम्बन्धित अंशों को संज्ञान में लेने का आग्रह किया । वर्ष 1935 में जन्मे राजेश्वर जी 1953 से 62 तक कलकत्ते में पढ़े। वही से एम0ए0 एलएलबी किया। स्टूडेंट फेडरेशन में सक्रिय रहे। वामपंथी आंदोलन से जुड़े। कुछ दिन वहीं डिग्री कालेज में पढ़ाया।इसके साथ ही विश्वमित्र दैनिक में लिखा।आचार्य विष्णु कांत शास्त्री और कल्याण मल लोढा जैसे गुरुजन की निकटता में सृजन के संस्कार पाए।

सुल्तानपुर वापसी में जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता रहे बाबू श्रीनाथ सिंह के जूनियर बने। 1962 में ही “जनमोर्चा” दैनिक अखबार से जुड़े। पत्रकारिता के पांच दशकों के अधिक के सक्रिय जुड़ाव में सुल्तानपुर के राजनीतिक- सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक जीवन की हर धड़कन के वह गवाह रहे। इतिहास में अपनी रुचि के कारण लगातार अतीत में झांकते, वर्तमान को समझते और भविष्य के बेहतर सुल्तानपुर के लिए वह लिखते- और लोगों को सचेत करते रहे।

जीवन से अलविदा होने की खबर से जिले के वरिष्ठ,युवा बौद्धिक पत्रकारों, लेखकों, कवियों-शायरों और कला-संस्कृति से जुड़े तमाम लोगों को अखर रहा उन्हें बेहद जो उनके ज्यादा करीब रहे है। वह भले ही हमारे बीच अब नही रहे पर वह हमेशा कई दशकों तक याद किये जायेंगे। नमन करते हुए उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धाजंली…।

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