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प्रवासी श्रमिकों को बच्चों की शिक्षा, बहन-बेटी के व्याह की चिंता

आर्यनगर, गोंडा। लुधियाना, दिल्ली, अहमदाबाद, कोलकाता, हरियाणा, मुम्बई आदि प्रान्तों में रहकर प्रवासी अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगत कर रहे थे। कोरोना संकट के चलते वह जैसे-तैसे घरों को वापस हो रहे हैं। काम धंधा ख़त्म होने से उनको हमेशा भविष्य की चिंता सताने लगी है। परिवार का खर्च कैसे चलेगा। बच्चों की पढाई कैसे होगी, बहन-बेटी के हाथ कैसे पीले होंगे यह सवाल उन्हें आज परेशान कर रहे हैं।

लुधियाना से आये ब्लाक रूपईडीह की ग्राम पंचायत छितौनी निवासी अमित कुमार चार साल से अपने माता सावित्री, पत्नी रिंका व बहन पारव के साथ साईकिल का सामान बनाने वाले कम्पनी में काम करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे थे। लाकडाउन के चलते उनकी कम्पनी बंद हो गई। जिससे वह विवश होकर पूरे परिवार के साथ 15 दिन पहले श्रमिक ट्रेन से घर आ गये हैं।

उन्होंने बताया कि अब वह अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए मनरेगा के तहत ग्राम पंचायत द्वारा कराये जा रहे जलाशय का जीर्णाेद्धार कार्य में मजदूरी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि भविष्य में उन्हें पुनः लुधियान जाने का मौका मिला तो वह दुबारा कंपनी में कार्य करेंगे। केवल मनरेगा में मजदूरी करने से उनके बच्चों की पढाई व भरण पोषण हो पाना मुश्किल लग रहा है।

यहां के ग्राम प्रधान रामकरन चतुर्वेदी ने बताया कि मनरेगा के तहत तालाबो का सौंदर्यीकरण, खेतो की मेढबंदी, पौधरोपण व संपर्क मार्गाे का निर्माण कराये जाने के लिए कार्ययोजना तैयार की गई। उन्होंने बताया कि ग्राम पंचायत में गैर प्रान्तों से आये हुए प्रवासी मजदूरों को मनरेगा के तहत जाबकार्ड बनवाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उनका यह पूरा प्रयास होगा कि सभी प्रवासी मजदूरों को मजदूरी के लिए इधर उधर भटकना न पड़े।

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