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किसान फिर होंगे खुशहाल

  • उत्तम खेती-मध्यम बाननिकृष्ठ चाकरी भीख निदान
  • किसानों के लिए एक लाख करोड़ का पैकेज
  • आखिर किसानों की भी चिंता की मोदी जी ने

आर. के. सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ संपादक,स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)


मारे देष में एक बहुत ही पुरानी कहावत प्रचलित है। “उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ठ चाकरी भीख निदान।” कहने का अर्थ यह है कि सबसे अच्छा कार्य या बेहतर पेशा तो खेती ही है और दूसरे दर्ज पर व्यापार है।  नौकरी को तो कहा गया है कि वह तो निकृष्ठ है, जो भीख मांगने के समान है। लेकिन, 70 वर्षों में विदेशों की नकल करके हमारे कर्णधारों ने देश की स्थिति को बदल दिया है। अब तो निकृष्ठ नौकरी को ही सबसे बढ़िया पेशा माना जा रहा है, और उसके ही बाद व्यापार भी है। सबसे निकृष्ठ आज अन्नदाताओं का कार्य कृषि बन गया है।

यह स्थिति जो सत्तर सालों में उल्टी हो गयी है उसको वापस पटरी पर लाने के लिए ही “आत्मनिर्भर भारत योजना” के तहत प्रधानमंत्री मोदी जी ने किसानों,  पशुपालकों और मछली पालकों के लिए एक लाख करोड़ रूपये का पैकेज कल घोषित किया। वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सितामरण जी ने अपने प्रेस कांफ्रेस में कल इसकी विस्तृत जानकारी दी, जिससे कि अब ऐसा लग रहा है कि किसानों के भाग्य सत्तर वर्षों के बाद अब फिरने वाले हैं।

किसानों के सामने हाल के वर्षों में जो सबसे बड़ी समस्या देखने को आ रही थी, वह दो किस्म की थी। पहली समस्या यह थी कि इंदिरा गांधी के जमाने में देश भर में कृषि उत्पादन बाजार समितियों का गठन किया गया था। ये बाजार समितियां अच्छी नीयत से ही गठित की गयी होंगी, लेकिन, अब तो यह  भ्रष्टाचार का अड्डा बन कर रह गया है। अब यह सभी किसानों के लिए कानूनन ध्याता बना दी गई थी कि वे अपने कृषि उत्पादों को कृषि उत्पादन बाजार समितियों के मंडी में ही बेंचें । यहां खरीदने- बेचने का काम तो कम होता था । लेकिन, रसीद काटने का काम और घूसखोरी का काम धड़ल्ले से जारी था।

तो इस प्रकार से ये कृषि उत्पादन बाजार समितियां भ्रष्टाचार का बड़ा अड्डा बन गयी थी।  क्योंकि, यह संभव है ही नहीं कि एक इलाके में या एक अनुमंडल में किसान जो भी उत्पादन कर रहे हैं वह सारा का सारा वहीं बिक जायेगा। मूलतः यह एक गलत योजना थी । लेकिन, चली आ रही थी पिछले पचास वर्षों से। होता यह था कि किसान रसीद भी कटवाते थे और फिर वहां के अधिकारियों को घूस भी देते थे, ताकि वे अपना माल अच्छी कीमत पर जहां बिक सकता है वहां जाकर बेंचें। इससे तो किसानों को उत्पाद बेचने के पहले ही नुकसान हो जाता था।

रांची से जायें डाल्टेनगंज की रोड पर तो मांडर से चान्हों तक या यों कहें कि कुडू तक पचास किलोमीटर रोड पर सुबह-सुबह सैकड़ों ट्रक लगे मिलेंगे और गरीब आदिवासी किसान खुद बोरियों को लादकर सड़क किनारे लाकर अपने फल और सब्जियां बेचते मिलेंगे। जो टमाटर आपको महानगरों में 50 रूपये किलो मिलेंगा, वे बेचारे गरीब छोटे किसान 25 पैसे या 50 पैसे किलो के भाव बेचकर इन ट्रकवालों को दे देंगे जो कि उसे सीधे कलकत्ता के बाजार में ले जाकर महंगे भाव बेच देंगे। अब बाजार समितियों से रसीद कटवाना या पदाधिकारियों को घूस देना इन व्यापारियों का काम रह गया है।

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