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अयोध्या राम मंदिर में पौराणिकता और आधुनिकता का समावेश होगा

रामजन्मभूमि के 70 एकड़ परिसर का मास्टर प्लान लगभग तैयार है। शीघ्र ही तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों की सहमति के बाद इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इस मास्टर प्लान में रामलला के मुख्य मंदिर के साथ पूरे परिक्षेत्र को आधुनिकतम दृष्टि से विकसित करने का सुझाव है जिसमें पौराणिकता और आधुनिकता दोनों का समावेश होगा। सृष्टि के विकास के क्रम में हुए दशावतार में भगवान राम को मानव स्वरूप में पूर्णावतार माना गया है।

रामलला के अवतरण के काल निर्धारण में भले मतभेद हो फिर भी आर्षग्रंथों के आधार पर उनका कालखंड दस हजार वर्ष पूर्व माना गया। इसी पौराणिक विरासत को आधुनिक तकनीक से जोड़कर ऋषि परम्परा की वैज्ञानिक दृष्टि से लोगों परिचित कराया जाएगा। इसके लिए डिजिटल माध्यमों का प्रयोग किया जाएगा। इसी थीम को ध्यान में रखकर मुक्ताकाश व लेजर शो के लिए स्थान नियत किया गया है।

परिसर में सत्संग भवन जहां रामायण व श्रीमद भागवत की कथाओं के माध्यम से भगवान का गुणगान करने मंच के साथ भक्तों-श्रोताओं के बैठने के लिए एलईडी स्क्रीन युक्त सभागार की भी व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है। चारों दिशाओं में अलग-अलग नामकरण के साथ द्वार भी बनाए जाएंगे जिसमें पूर्व का द्वार हनुमत द्वार होगा। यह मुख्य मंदिर का द्वार भी रहेगा।

इसके अलावा पश्चिम में नल द्वार व दक्षिण में अंगद द्वार व उत्तर में सरयू द्वार की भी कल्पना की गयी है। नल द्वार के ही निकट सिक्योरिटी कंट्रोल रूम, सिक्योरिटी क्लाक रूम, सेंट्रलाइज्ड वाटर फिल्टर प्लांट, मल्टीलेवल पार्किंग, पब्लिक लाइब्रेरी, आर्काइव लाइब्रेरी एवं भगवान के प्रसाद वितरण अथवा सीता रसोई के प्राप्त करने के लिए प्रसादालय व जनसुविधा जिनमें शौचालय इत्यादि का प्रबंध रहेगा।

मुख्य मंदिर के उत्तर-पूर्व में पराम्बा-जगदम्बा जानकी का होगा मंदिर

रामजन्मभूमि परिसर में रामलला के मुख्य मंदिर के साथ ही पूर्व में सीता रसोई पर आधारित जनकनंदिनी सीता देवी का मंदिर होगा। वहीं विराजमान भगवान के भोग-राग के लिए प्रसाद निर्माण के लिए पारंपरिक रसोई भी होगी। इसी के पार्श्व में अनुष्ठान आदि के लिए यज्ञस्थल भी होगा। इसके ही कुबेर टीला पर स्थित शेषावतार मंदिर का भी निर्माण कराया जाएगा।

यहीं गौशाला की स्थापना के साथ परिसर में पहले से मौजूद सीताकूप को भी दर्शनीय बनाया जाएगा। कहा जाता है कि इस सीताकूप में सात पवित्र नदियों का जल मिश्रित है। पहले परिवारों में मूल नक्षत्र में पैदा होने वाले बच्चों के लिए होने वाले सत्तईसा पूजन के लिए जल यहीं से लोग ले जाते थे।

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