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व्लादिमीर पुतिन के दौरे से पहले रक्षा मंत्रालय का बड़ा फैसला, 5000 करोड़ रुपए की AK-203 असॉल्ट राइफल डील को मंजूरी

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अगले महीने भारत आने की उम्मीद के साथ रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के अमेठी में 7.5 लाख एके-203 असॉल्ट राइफल (AK-203 Assault Rifle)  के निर्माण के लिए रूस के साथ 5,000 करोड़ रुपए से अधिक के सौदे को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी. रक्षा सूत्रों ने बताया कि मंगलवार को रक्षा अधिग्रहण परिषद की बैठक में इसे मंजूरी दे दी गई है. रूस में डिजाइन की गई एके-203 अमेठी की एक फैक्ट्री में बनाई जाएगी. उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले दोनों पक्षों के बीच समझौते पर सहमति बनी थी और अब आखिरी प्रमुख मुद्दा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मुद्दों को हल करना होगा. भारतीय सेना द्वारा अधिग्रहित की जाने वाली 7.5 लाख राइफल में से पहले 70,000 में रूसी निर्मित होंगी, क्योंकि प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण धीरे-धीरे होता है. उत्पादन प्रक्रिया शुरू होने के 32 महीने बाद इन्हें सेना को दिया जाएगा.

AK-203 अबतक की सबसे एडवांस राइफल

एके-सीरीज की ये अबतक की सबसे एडवांस्‍ड राइफल है. एके-47 सबसे बेसिक मॉडल है. इसके बाद एके- 74, 56, 100 और 200 सीरीज आ चुकी है. एके-203 राइफल को पूरी तरह से लोड कर दिए जाने के बाद इसका वजन 4 किलोग्राम के आसपास हो जाएगा. एके-203 राइफल में ऑटोमैटिक और सेमी-ऑटोमैटिक दोनों तरह के वैरियंट मौजूद होंगे. हाइटेक एके-203 राइफल से एक मिनट में 600 गोलियां दागी जा सकती हैं.

ये राइफल 400 मीटर दूरी पर स्थित दुश्मन पर भी निशाना साध सकती है. इस राइफल को भारत और रूस मिलकर तैयार कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश के अमेठी में इसका निर्माण होगा. भारतीय सेना को दुनिया की सबसे टॉप 5 सबसे ताकतवर सेनाओं में शामिल किया जाता है. अमेरिका और चीन के बाद इंडियन आर्मी का नंबर आता है. भारतीय सेना यूं तो कई तरह के हथियारों से लैस है. तमाम तरह के हथियारों के बीच ही सेना की ताकत है उसके पास मौजूद बंदूकें.

इंसास राइफल

इंसास वो राइफल है जिसका प्रयोग सेना के साथ ही साथ दूसरे सशस्‍त्र बल भी करते हैं. इस राइफल को एके-47 की तर्ज पर बनाया गया है. INSAS यानी इंडियन स्‍मॉल आर्म सिस्‍टम और इसे भारत में ही तैयार किया जाता है. इस राइफल का उत्‍पादन सन् 1994 में पहली बार हुआ था. पहली झलक सन् 1998 में गणतंत्र दिवस की परेड में मिली और सन् 1999 कारगिल वॉर में इसका जमकर प्रयोग हुआ.

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