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प्रशांत भूषण अवमानना केस में सजा पर फैसला सुरक्षित

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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना के मामले में प्रशांत भूषण की सजा पर फैसला सुरक्षित रख लिया है. अदालत ने प्रशांत भूषण को बीते पांच अगस्त को अवमानना का दोषी करार दिया था. इससे पहले 14 अगस्त को शीर्ष अदालत ने प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के खिलाफ बयान देने का दोषी ठहराया था. भूषण ने सीजेआई बोबडे के लिए, भाजपा नेता के स्वामित्व वाली मोटरसाइकिल पर बैठे हुए एक तस्वीर को ट्वीट किया था. पिछले सीजेआई के लिए, उन्होंने ट्वीट किया था कि वह लोकतंत्र के कार्य को बाधित कर रहे हैं.

आज अदालत ने भूषण के माफी नहीं देने पर निराशा व्यक्त की और कहा कि वह कुछ बेहतर की उम्मीद कर रहे थे. अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि अदालत को इस मामले को भविष्य में फिर से न दोहराने की चेतावनी देने की अनुमति देनी चाहिए. इसके अलावा अटॉर्नी जनरल ने यह भी सुझाव दिया कि भूषण को अपने आरोप वापस लेने चाहिए. भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि उनके बयान को वापस लेने का कोई सवाल नहीं है, क्योंकि यह उनके बचाव का एक हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि भूषण एक माफी के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि वह अभी भी मानते हैं कि उन्होंने, जो कहा वह कानून के खिलाफ था. इस पर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा कि यह भूषण जैसे अधिवक्ता नहीं हैं, न्यायमूर्ति मिश्रा ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे अधिवक्ता मीडिया से बात करते हैं ,जब मामला अधीन होता है और न्यायाधीशों पर हमला करते हैं. जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर हम एक-दूसरे को इस तरह से नीचे दिखाते रहेंगे , तो हम खत्म हो जाएंगे.

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि आप महात्मा गांधी को उद्धृत करते हैं, लेकिन आप माफी नहीं मांग सकते. न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि रिटायर्मेंट से पहले यह सब नोट करना बहुत दर्दनाक है कि कोइ उस पर सवाल उठाए. मामले में कोर्ट ने प्रशांत भूषण से माफी की अपील करने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा कि वह सच के सामने लेकर आए हैं. इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने कार्यकर्ता-अधिवक्ता प्रशांत भूषण तथा पत्रकार तरूण तेजपाल के खिलाफ 2009 के अवमानना मामले को मंगलवार को दूसरी पीठ को सौंपने का फैसला किया है.

एक समाचार पत्रिका को दिए साक्षात्कार में भूषण ने शीर्ष अदालत के कुछ तत्कालीन न्यायाधीशों और पूर्व न्यायाधीशों पर कथित तौर पर कुछ आरोप लगाए थे, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने नवंबर 2009 में भूषण और तेजपाल को अवमानना के नोटिस जारी किये थे. जिस पत्रिका को भूषण ने साक्षात्कार दिया था, उसके संपादक तेजपाल थे. न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष प्रशांत भूषण की ओर से पेश अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा था कि उनके मुवक्किल की ओर से उठाए गए कम से कम दस प्रश्न ऐसे हैं, जो संवैधानिक महत्व के हैं तथा उन्हें संविधान पीठ को ही देखने की जरूरत है.

न्यायमूर्ति बीआर गवई तथा न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी भी पीठ का हिस्सा हैं. पीठ ने कहा, ये व्यापक मुद्दे हैं, जिन पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है. हम इसमें न्याय मित्र की मदद ले सकते हैं और मामले पर एक उपयुक्त पीठ विचार कर सकती है. वीडियो कॉन्फ्रेस के माध्यम से हुई सुनवाई में पीठ ने कहा कि यह मामला काफी समय से लंबित है, इसे 10 सितंबर को एक उपयुक्त पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए. दो सितंबर को सेवानिवृत्त होने जा रहे न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि इस मामले को देखने के लिए समय चाहिए अत: इसे एक उपयुक्त पीठ को सौंपते हैं.

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